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वो लौट आएँगे, फिर से पिता बनकर

पिता अब नहीं रहे, सिर्फ़ उनके द्वारा बनायी स्मृतियाँ शेष रह गई है। जन्माष्टमी के दिन वो हमें सदा के लिए छोड़कर चले गए। पिता का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं होता, वह एक पूरे आकाश का चुपचाप ढह जाना सा होता है; वही आकाश जिसके नीचे खड़े होकर हमने जीवन की पहली धूप देखी, पहली बारिश में भीगे थे और यह विश्वास पाला था कि जब तक यह आकाश हमारे सिर पर है, कोई तूफ़ान हमें छू नहीं पायेगा। और आज अचानक से, बिना कुछ कहें, बिना कुछ बताएँ, वे धुंध की एक गहरी चादर में कहीं खो गए। जैसे सर्दी के मौसम में धुंध धीरे धीरे पहाड़ी पर उतरती है, पहले सामने का एक पहाड़ उस धुंध में समाता है, फिर दूसरा और देखते देखते धुंध सारी पहाड़ियों पर घिर आती है; आग़े कुछ नहीं दिखाई देता और सिर्फ़ एक सफ़ेद मौन सा पसर जाता है। ऐसे ही  पिता के जाते हुए भी ना ही कोई शोर हुआ, ना कोई चेतावनी आई; बस एक सफ़ेद धुँध में वो कहीं खो गए। उनके चले जाने से बस एक सन्नाटा सा रह गया  है, जो इतना भारी है कि मेरे कमजोर मन से उठाए नहीं उठ पा रहा है। मुझे अब भी लगता है कि ये धुंध जिसमें पिता खो गए है, थोड़ी देर में छट जाएगी और उनका...

अंतिम अरण्य - पुस्तक समीक्षा

अंतिम अरण्य निर्मल वर्मा द्वारा लिखा गया उपन्यास है। आखिरी रचना के तौर पर यह उपन्यास उनके द्वारा लिखा गया। निर्मल वर्मा नई कहानी आंदोलन के एक प्रणेता के तौर पर जाने जाते है। उनके द्वारा लिखी गई कहानी 'परिंदें' मैंने सर्वप्रथम पढ़ी थी।  यह उपन्यास वृद्धावस्था, स्मृति और मृत्यु के प्रश्नों के आसपास केन्द्रित है। अंतिम अरण्य न केवल एक कहानी है बल्कि स्मृति, मृत्यु और पहचान के सवालों पर निर्मल वर्मा की अंतिम, परिपक्व और चिंतनशील प्रस्तुति है। कथा एक छोटे पहाड़ी टाउन के परिवेश में चलती है जहाँ मेहरा साहब नामक वृद्ध पुरुष उपन्यास का केन्द्रीय पात्र है। उनकी पत्नी दीवा का जिक्र और उनकी एक बेटी तिया भी कथानक में आते हैं; कस्बे में एक जर्मन महिला अन्ना (Anna) तथा डॉ. सिंह, निरंजन बाबू, मुरलीधर आदि सहचरित्र मौजूद हैं। स्मृतियाँ अलग-अलग अध्यायों/खंडों में स्वतंत्र-स्वरूप रूप में आती हैं और एक समग्र ‘स्मृतिलोक’ बनाती हैं; इसलिए उपन्यास में घटनाओं की रैखिकता कम और स्मृतियों-केन्द्रित संरचना अधिक है। उपन्यास का परिवेश पहाड़ों और जंगलों का है। उपन्यास में पहाड़ और उसका सन्नाटा केवल पृष्ठभूमि ...