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तुम और यात्राएँ

  तुम और ये यात्राएँ — दोनों ही मेरे अस्तित्व के दो अभिन्न अध्याय हो और मेरे हृदय के सबसे अंतरंग कोनों में बसते हो। एक तुम हो, जो मेरे भीतर की नीरवता में संगीत भरते हो; और दूसरी ये यात्राएँ हैं जो मुझे उस संगीत की लय पर चलना सिखाती हैं। इन पहाड़ों की चुप्पी में, इन वादियों की सर्द हवा में, किसी अनकहे प्रेम का स्पर्श टिका रहता है — जैसे प्रकृति स्वयं हमारे हृदय की प्रेम रूपी भाषा को जानती हो। सुबह की पहली किरण में चमकती हुई, बर्फ़ से ढकी पर्वत चोटियाँ, मुझे बार-बार याद दिलाती हैं कि ऊँचाई पाने के लिए कठिनाई से गुजरना ही पड़ता है। जब कभी हम उन ऊँचे-नीचे रास्तों पर साथ चलते हैं, कभी फिसलते हैं, कभी थमकर साँस लेते हैं, तो लगता है जैसे जीवन का अर्थ भी यही है — गिरना, सम्भलना, और फिर साहस बटोर कर साथ आगे को बढ़ते जाना। सर्द हवाओं में जब अंगुलियाँ सुन्न हो जाती हैं, तब तुम्हारे हाथ की गर्माहट किसी सूरज की पहली किरण-सी लगती है। तुम्हारी उपस्थिति उस निःशब्द वातावरण में भी शब्दों से अधिक बोलती है। और जब रात उतरती है — पहाड़ों पर, पेड़ों के झुरमुटों पर, हमारे चेहरों पर — तो तारों की टिमटिमाहट...

दीवार में एक खिड़की रहती थी- पुस्तक समीक्षा

‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ विनोद कुमार शुक्ल जी का लिखा हुआ एक उपन्यास है। इस उपन्यास को वर्ष 1999 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है। शुक्ल जी द्वारा लिखित, मेरे द्वारा पढ़ा गया यह पहला उपन्यास है। यह उपन्यास लंबे समय से मेरी पठन सूची में था, लेकिन इसे पढ़ना उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त होने के बाद ही संभव हो पाया। यह उपन्यास काफी संक्षिप्त है, केवल 250 पन्नों का। यह उपन्यास अपने नाम की तरह ही अनोखा है। इसे पढ़ते हुए लगता है जैसे हम किसी ठहरे हुए, धीमे-धीमे खुलते जीवन के भीतर प्रवेश करते जा रहे हों। उपन्यास की कहानी एक निम्न मध्यम वर्ग के साधारण किरदार रघुवर प्रसाद (गणित के प्राध्यापक) और सोनसी से संबंधित है, जो अपने एक छोटे-से कमरे में रहते हुए, रोज़मर्रा की दिक़्क़तों के बीच अपने सपनों और भावनाओं के लिए जगह तलाशते हैं। उपन्यास में दीवार और खिड़की केवल ईंट-पत्थर की चीज़ें ना हो कर, एक प्रतीक हैं। दीवार प्रतीक है - स्थिरता, बंधन और रोज़मर्रा के जीवन का, जबकि खिड़की प्रतीक प्रत्येक है- संभावना, उम्मीद और खूबसूरती का। दीवार में रह रही यह खिड़की हमारे जीवन का खु...

आज शाम

मैंने आज शाम के रंगों को घुलते देखा घुलते हुए रंगों को बदलते हुए देखा उल्लास को अवसाद होते देखा अपने ख्वाबों को मरते हुए देखा... - शालिनी पाण्डेय 

अब

छोटी- छोटी खुशियां छोटे - छोटे तोहफे छोटी - छोटी तकरार छोटी - छोटी मुलाकातें थोड़ा - थोड़ा इंतजार थोड़े-थोड़े हम और तुम अब नहीं रह गए हैं.. अब हमारे बीच बची रह गयी हैं  केवल बड़ी-बड़ी आदर्शवादी बातें... - शालिनी पाण्डेय

गुजरते रास्ते

एक गहरी खामोशी मौजूद रहती है जंगल में दूर तक फैली चीड़ की कतारों के बीच  खामोशी जिसमें कई बार डूबते- तैरते हुए सी मैं पहुँच आती हूं अपने भीतर फैली प्रश्नों की खाई में तब मुझे ननजर आ जाती है अपनी सूक्ष्मता भीतर का खोखलापन और स्वार्थपरकता चट्टानों और पत्थरों से घिरे इन कतारों से गुजरते हुए मैं महसूस करती हूं सृष्टि की विशालता इसकी सृजनात्मकता, करुणा और प्रेम को मैं रख देती हूं इसके सामने निचोड़ कर अपनी न्यूनता को और सोख लेना चाहती हूं इस सृजनात्मकता और प्रेम का कुछ अंश अपने भीतर। - शालिनी पाण्डेय 

व्यक्ति की सफलता

जीवन के किसी भी आयाम में व्यक्ति को सफलता नहीं मिलती केवल उसके अकेले के प्रयासों से वो मिलती है उन सभी लोगों के  प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रयासों से भी जिन्हें वो कई बार  जीवन की दौड़ में भूल सा जाता है। -शालिनी पाण्डेय 

तुम्हारे बारे में

तुम्हारे बारे में जितना भी जिक्र करूँ कम है... तुम्हारी याद में जितनी भी कविताएं लिखूं कम है... तुम्हारे साथ में जितनी भी यात्राएं करूँ  कम है... तुम्हारे विछोह में जितनी भी आहें भरूँ कम है..... -शालिनी पाण्डेय 

लंबी यात्रा

मैंने पूछा कैसी चल रही तैयारी? उसने कहा - लंबी यात्रा है। मैंने कहा- ये जीवन एक यात्रा ही तो है, तुम क्या हम सभी इस यात्रा के यात्री है। - शालिनी पाण्डेय

जब मैं लौट आयी हूं

अब जब मैं लौट आयी हूं पहाड़ पर, तो सारे नजारों को मैं अपने भीतर समेट लेना चाहती हूं। भीड़ से अलग पहाड़ के जीवन में एक अलग सुकून है, बीते वक़्त की ग्लानि, भविष्य की चिंताओं से परे, हर लम्हें को बस जीते जाने का मन करता है। यहां के पेड़, पहाड़, रास्तों की तरह हर अजनबी की आंख में भी  थोड़ा अपनापन है शाम की ठंडी बयार जैसे  यहाँ जीवन धीमा सा संगीत लिए  बह रहा है....   -शालिनी पाण्डेय

वेदना

जैसे  चेहरे के आवरण से ढकी हुई है मन की गहन वेदना वैसे ही  खूबसूरती हरे पहाड़ों की छुपाये रहती है   वेदना संघर्षमय जीवन की वेदना  जो अंधेरे में लौ जगाये हुए है वेदना जो साहस बंधाये हुए है वेदना  जो सहने की क्षमता दिये हुए है और समेटे हुए है गहराईयों में इतना दर्द  जो किसी से भी सांझा नहीं किया जा सकता.... - शालिनी पाण्डेय

आलिंगन

दिन भर की बरसात के बाद रात ने ओढ़ ली एक गहरी खामोशी  मानो जैसे बहुत स्नेह से प्रेमी ने उसे आलिंगन कर लिया हो। - शालिनी पाण्डेय

संभावनाएं

सर्द शाम की वो मुलाक़ात जब धुंध की गहरी परत फैली हुई थी, हम दोनों के बीच.... उसी रोज, मैंने, जी जा सकने वाली अनगिनत संभावनाओं को समेट लिया था हमारे प्यार के भीतर.... - शालिनी पाण्डेय

पहाड़ के जीवन में

आत्मा को डुबो देने वाला एक सौन्दर्य है पहाड़ के जीवन में, हवा के साथ बहता भीना सा एक संगीत है पहाड़ के जीवन में, वर्षों का पुराना इतिहास, पुरखों का आशीष है पहाड़ के जीवन में,  और बहुत सारा प्यार , अपनापन है पहाड़ के जीवन में...  -शालिनी पाण्डेय 

जवान होने के सफर में

जवान होने के सफर में लड़कियां स्वीकार कर लेती है निर्धारित की गई अपनी नियति, वो सीख लेती है  अपने सपनों को उधेड़  किसी और के दरवाजे के लिए  क्रोशिया सीना; और निकल पड़ती हैं कभी ना खत्म होने वाली आदर्श स्त्री बन पाने की दौड़ में... - शालिनी पाण्डेय 

विस्थापित

घर की वस्तुओं को  बदला जा सकता हैं ,  चीज़ों को विस्थापित  किया जा सकता हैं, लेकिन, नहीं बदला जा सकता है  तुम्हारे लिए मेरे प्रेम को; ना ही विस्थापित  किया जा सकता है तुम्हें किसी और प्रेमी से। - शालिनी पाण्डेय

साधना

तुम्हारी प्रेमिका हो जाने में न केवल जुड़ी हुई हैं संवेदनाएं और भावनाएं; बल्कि, इस प्रेम के साथ जुड़ी हुई है, साधना परम सत्य को खोजने की... - शालिनी पाण्डेय 

तुम्हारी यादें

तुम्हारी यादें  मेरे घर की  सभी चीजों को घेरे हुए है, चाहे वो चाय की प्याली हो या मेज पर पड़ी किताब मेरे घर की बालकॉनी,  रोशनदान, छत, दीवार, खिड़की, दरवाज़े सब तुम्हारी यादों से पटे हुए है काश! इन यादों जैसे तुम भी होते मौजूद  इस घर के किसी हिस्से में... - शालिनी पाण्डेय

माँ

यूँ तो अब मुझे आदत सी हो चली है अकेलेपन और  नीरस दिनचर्या की, शहर की इस  नीरस दिनचर्या में उलझे हुए वक़्त आसानी से गुज़र जाता है लेकिन,  जब कभी हो  कोई खास दिन  जैसे कोई त्योहार या जन्मदिन तब, तुम मुझे  बहुत याद आती हो माँ। - शालिनी पाण्डेय 

मिलना

जीवन की  उबड़-खाबड़ राह के  एक मोड़ पर  किसी रोज तुम मिले  मिलना यूँ तो एक  क्रिया है  पर तुम्हारा मिलना  एक एहसास है  वो एहसास जो  बाधें रखता है  प्राणों को शरीर से  ठीक वैसे ही जैसे  डोरें बाधें रहती हैं  नाव को छोर से  खाली वक़्त में  - शालिनी पाण्डेय 

चरवाहे

एक रोज  मैं चली आऊँगी तुम्हारे पास, ठीक वैसे ही  जैसे  लौट आते है चरवाहे  शिशिर के बाद अपने-अपने घरों को... -शालिनी पाण्डेय