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छप्पर

पहाड़ की यादों को समेटकर मैंने बना लिया है छप्पर, खरीद ली है कुछ भेड़े जिन्हें चराते हुए, फाग गाते हुए, बुग्यालों और गधेरों को पार कर मैं रोज़ थोड़ा -थोड़ा  चली आती हूं  तुम्हारी ओर को  सांझ अपने घर में बिताने.... - शालिनी पाण्डेय 

क्या तुम मुझे याद करोगे?

  क्या तुम मुझे याद करोगे? जब सांझ में दूर पहाड़ी से  टकराकर आती आवाज़ेंं  तुम्हें सुनाया करेगी  तन्हाइयों भरा राग.... क्या तुम मुझे याद करोगे? जब बारिश की झमाझम पत्तों, टहनियों से गिरते हुए तुम्हारे किवाड़ के सामने गुनगुनायेगी सावन का गीत ... क्या तुम मुझे याद करोगे? जब मैं समा जाऊंगी काले स्याह आकाश में, फिर से किसी पहाड़ पर फ्योंली बनकर फूटने के लिए... -शालिनी पाण्डेय 

जीने की चाह

बचपन की यादों से भरा गांव का आंगन अब धुंधला हो चला है; सांझ की हवा के साथ सैम ज्यूँ के थान से आने वाली घण्टियों की खनक  गुम सी गयी है; गोबर से लीपे हुए अम्मा के चूल्हें की  लकड़ियों की ताप अब मुझ तक नहीं पहुँचती; जो भी मुझे प्यारे थे,  उन सभी रिश्तों ने दूरी की एक परत ओढ़कर  खुद को अलग कर लिया है; और वो जीवन !! जिसे जीने की  मुझे बहुत चाह थी अब कहीं खो सी गयी है। - शालिनी पाण्डेय

यादों का पहाड़

ये जो तेरे और मेरे बीच के फासले है, उन पर मैं रोप दूंगी देवदार, सभी दुःखोंं को इकट्ठा कर बना दूंगी, एक नदी और विचरने के लिए बसा लूंगी, यादों का पहाड़। - शालिनी पाण्डेय

छोटी कहानी : 3

मैं लौट जाऊंगी, एक दिन पहाड़ को ... कब ??.......  ये निश्चित तौर पर अभी नहीं कह सकती। शायद जब कंक्रीट से मन ऊब जायेगा तब या फिर शायद जब नौकरी मिल जाएगी या फिर शायद तब, जब अम्मा की कहानियों और जीवन के किरदार मेरा हाथ पकड़ मुझे खींच ले जायेंगे, उन सभी जगहों पर जो मेरी कल्पनाओं को रंगते हैं, वो किरदार जो अम्मा ने मुझे दिए, पुरखों की धरोहर के रूप में। अभी तक पहाड़ की दुनिया का चित्र मैंने बस उनके जीवन को सुन कर खींचा हैं।  मैंने पहाड़ को उनके किस्से और कहानियों के रूप में जिया हैं;  मेरी खुद की कोई कहानी नहीं है पहाड़ पर। भाभर में मैंने उनको सफ़ेद साड़ी में ही देखा । उनके सुखी और सुहागन होने को मैंने बुरांश के बूटों, घास के डानों, बण को ले जाने वाले खाजों, मडुए से भरे भकार, अखरोट के पेड़, नौले के पानी, पनार की गाड़, घट्ट पीसने, ब्यासी में देवता पूजने, तल बाखई की चहलपहल, तौली में भात पकाने, सकुन आखर गाने, ठुल कुड़ी वाले पड़ोसियों आदि से जोड़ दिया। इन सभी चीजों से बिछड़ने की टीस और भाभर आने पर दादा की मौत के दुःख से वो आखिरी सांस तक जद्दोज़हद करती रह...