वो लौट आएँगे, फिर से पिता बनकर
पिता अब नहीं रहे, सिर्फ़ उनके द्वारा बनायी स्मृतियाँ शेष रह गई है। जन्माष्टमी के दिन वो हमें सदा के लिए छोड़कर चले गए। पिता का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं होता, वह एक पूरे आकाश का चुपचाप ढह जाना सा होता है; वही आकाश जिसके नीचे खड़े होकर हमने जीवन की पहली धूप देखी, पहली बारिश में भीगे थे और यह विश्वास पाला था कि जब तक यह आकाश हमारे सिर पर है, कोई तूफ़ान हमें छू नहीं पायेगा। और आज अचानक से, बिना कुछ कहें, बिना कुछ बताएँ, वे धुंध की एक गहरी चादर में कहीं खो गए। जैसे सर्दी के मौसम में धुंध धीरे धीरे पहाड़ी पर उतरती है, पहले सामने का एक पहाड़ उस धुंध में समाता है, फिर दूसरा और देखते देखते धुंध सारी पहाड़ियों पर घिर आती है; आग़े कुछ नहीं दिखाई देता और सिर्फ़ एक सफ़ेद मौन सा पसर जाता है। ऐसे ही पिता के जाते हुए भी ना ही कोई शोर हुआ, ना कोई चेतावनी आई; बस एक सफ़ेद धुँध में वो कहीं खो गए। उनके चले जाने से बस एक सन्नाटा सा रह गया है, जो इतना भारी है कि मेरे कमजोर मन से उठाए नहीं उठ पा रहा है। मुझे अब भी लगता है कि ये धुंध जिसमें पिता खो गए है, थोड़ी देर में छट जाएगी और उनका...