Posts

Showing posts with the label From my pen

मैंने कहा था

देखा मैंने कहा था कि तुम नहीं आओगे। सही कहा था ना? अब जब तुम कहीं गए ही नहीं  तो आते कैसे? - शालिनी पाण्डेय

एक रिश्ता

एक रिश्ता लंबे संवाद का गहरे अहसास का द्वंदों को उजागर करने का विचारों पर बहस करने का एक रिश्ता ग़ज़लों को सुनने का साहित्य को समझने का गीतों को गुनगुनाने का सांझ में याद आन...

गीत जैसे

गीत जैसे गुनगुनाते हो तुम मेरे भीतर और घोल जाते हो ख़ुद को मुझ में। - शालिनी पाण्डेय

कविता की तरह

तुम मेरे जीवन में आये कविता की तरह वही कविता जो मेरी पसंदीदा थी शायद इसीलिए तुम्हें संजो के रख पाना भी उतना ही मुश्किल था जितना उस कविता के अर्थ को यथार्थ पर उतार पाना। -शाल...

कुहासा

सर्द मौसम में जब कुहासे ने ढक लिया तो मैंने प्यार की लौ जलाई और झोंक दिए उसमें अपने सारे सपने एक-एक करके। - शालिनी पाण्डेय

चेहरे

आदमियों से ठसाठस भरी शहरी दुनिया हर दिन नए चेहरे और मेरे पहाड़ में रह गयी हैं सिर्फ आँखें बूढ़ी, जर्जर आँखें जो इंतज़ार में है पुराने चेहरों के लौट आने के। -शालिनी पाण्डेय

रिक्तता

रिक्तता भीतर की जो कि भरना चाहती है कविता, ग़ज़ल, प्यार, दोस्ती, यात्रा, किताब, संगीत, कला, युद्ध, विजय आदि जैसे माने है इसे भरने के बावजूद इसके भी नहीं भर पाती है और हमारे ही किसी ...

इतिहास का विषय

पहाड़ से मैदान की ओर लगातार बह रहा लोगों का हुज़ूम एक दिन बना देगा पहाड़ के जीवन को सिंधु घाटी की तरह इतिहास का एक विषय जो पढ़ाया जाएगा बिना समझे ही स्कूल में हमारे द्वारा। - शाल...

क्यूं

अब जब मैं निकल आई हूं तुमसे दूर इतना दूर कि सूरज की रोशनी भी मुझे नहीं छू सकती अब तुम क्यूं मुझे वापस ढूढंने निकले हो? --  शालिनी पाण्डेय

शीशे की नाराजगी

Image
मेरे घर का शीशा कितना नाराज हुआ जब तुम आये थे तुम बिल्कुल मेरे प्रतिबिंब जैसे थे हाड़ मास से नहीं वरन संवेदनाओं से। - शालिनी पाण्डेय

घटनाएं

ये रोजमर्रा की घटनाओं वाली दुनिया हर पल कुछ घट रहा है और साथ ही घट रहे है जीने के दिन भी। - शालिनी पाण्डेय

इमारत

सोचती हूँ तुम्हारे लिए एक इमारत बनाऊ कंकड़ पत्थर संगमरमर से नहीं वरन शब्दों, कलम और कविताओं से जहाँ तुम दुनिया से थक जाने पर आराम कर सकोगें। - शालिनी पाण्डेय

यादों की याद

तुम्हारा आंचल जब मुझे बचा लेता था भयंकर अवसाद से तुम्हारी गोद जब मुझे सुस्ताने देती थी थका देने वाली भागदौड़ से तुम्हारा पसीना जब मुझे एहसास नहीं होने देता था जी को जला देन...

किरदार

ना सिग्नल थे ना सोशल मीडिया ना दोस्तों का हुजूम ना ही पहचाना शहर बस तुम थे और जीवन का सफर तुम तुम जैसे थे मैं मैं जैसी ना कोई वादे थे ना कोई बंदिशें बस दो किरदार थे अपने आप को ख...

जिंदगी

लंबे सफर में जब मीलों तक कोई आस पास नहीं दिखता लोगों से भरे हुए सड़क पर जब शोर नहीं सुनाई देता सिर्फ तभी मुझे कितनी साफ नजर आती हो तुम जिंदगी। -- शालिनी पाण्डेय

सर्दी के एक रोज

सर्दी के एक रोज मैं ताप रही थी एक रिश्ते की गर्माहट को आंखे मूंदे थाप रही थी साथ वाली तस्वीर को  आती सांस के साथ पाट रही थी बीच के फैसलों को और लकीरों पर सजा रही थी तुम्हारे न...

रिक्तता

कही भीतर कुछ है जो भरने की कोशिश में लगा है पर इसके बावजूद भी खाली सा रह जाता है। दिन की रोशनी में लगता है पूरा हो रहा है लेकिन रात फिर इसे अधूरा कर जाती है क्या ये तुम्हारे आन...

मैं तुझे जोड़ देती हूं

मैं तुझे जोड़ देती हूं हर उस कविता से हर उस कहानी से हर उस गीत से जिनमें आस है मिलन की मैं तुझे जोड़ देती हूं हर उस शेर से हर उस ग़ज़ल से हर उस दृश्य से जिसमें टीस है बिछड़न की मैं तुझ...

टक्कर

राह चलते वो मुझसे टकराई थोड़ा पास आयी और मुस्काई मेरी रूह बेनूर हो गई नजदीकियां जब यूँ टकराई -शालिनी पाण्डेय

कौन

मैं कौन हूं? ये प्रश्न बार बार मेरे सामने आता है कई बार खुद ब खुद कई बार लाया जाता है मैं कविता हूं नहीं, मैं कहानी हूं जिसका अंत होता है मैं क्या हूं? क्या मैं सचमुच कुछ हूं? क्य...