इमारत


सोचती हूँ
तुम्हारे लिए
एक
इमारत बनाऊ

कंकड़
पत्थर
संगमरमर से नहीं

वरन
शब्दों,
कलम
और कविताओं से

जहाँ तुम
दुनिया से थक
जाने पर
आराम कर सकोगें।

- शालिनी पाण्डेय

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