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ईर्ष्या

यूं तो ये अच्छी बात है कि बुढ़ज्यूँ मन लगा कर रात भर काम  कर रहे थे।

लेकिन बुढ़िया है कि उसे चैन नही पड़ता। कभी इधर को करवट बदलती, कभी उधर को, कभी उठ कर बैठ जाती, कभी पुरानी तस्वीरों को टटोलती, कभी साथ बिताए लम्हों को याद कर मंद मंद मुस्काती, कभी मेज पर रखी उसकी तस्वीर पर हाथ फेरती, कभी उसकी पसंद की नज़्म को गुनगुनाती, कभी अपनी उंगलियों से चादर पर उसका चित्र बनाती।

यही दिनचर्या है बुढ़िया की, उठते जागते हर वक़्त एक ही ख़्याल बुढ़िया का सहारा होता है और वो है उसके बुढ़ज्यूँ की यादें। ये यादें उसके जीवन की जमा पूंजी है जो उसके लिए बेसकीमती है और जिन्हें वो हर समय अपने सीने से लगाये रखती है।
यूं तो कई बरस हो गए दोनों को साथ में लेकिन बुढ़िया का प्यार है कि बुढ़ापे में और जवान होता जा रहा है।

ये बुढ़िया कभी कभी खाली वक़्त में मुझसे मिलने आ जाया करती है। बुढ़िया के पास बहुत से क़िस्से और अनुभव होते है मुझे सुनाने को और मजे की बात तो देखो कि ज्यादातर क़िस्से प्यार से जुड़े हुए होते है। बुढ़िया और बुढ़ज्यूँ के प्यार के क़िस्से।

जो कि मुझे कुछ ज्यादा समझ नही आते। मैं हुई व्हाट्स एप्प और फेसबुक के जमाने की फ़ास्ट जनरेशन। मुझे तो हर चीज की जल्दी रहती है । प्यार करने की जल्दी भी जल्दी और ब्रेक अप करने की भी। मेरे लिए तो रिश्ते मोबाइल फ़ोन के बैक कवर के जैसे थे जब एक से मन भर गया तो दूसरा फिर तीसरा और ये सिलसिला चलता रहता। तो फिर भला बुढ़िया वाले प्यार की गहराई मुझे मारियाना ट्रेंच जैसी लगनी जायज ही थी।

लेकिन समय का पहिया कभी रुकता नही। कुछ सालों बाद जब वो बुढ़िया इस दुनिया से विदा कर चली और मेरी चेहरे पर उम्र की जुररियां साफ दिखने लगी तब मुझे इस बुढ़िया से ईर्ष्या सी होने लगी, भला बुढ़ापे में कोई इतना प्यार कैसे कर सकता है?? और अब भी शायद मेरे लिए बुढ़िया के प्यार की गहराई को समझ पाना उतना ही मुश्किल था जितना कि आकाश के तारों को गिन पाना।

-शालिनी पाण्डेय

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