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आगमन

आगमन, जीवन किरणों का.. प्रस्फुटन, नव पल्लवों का.. सृजन, नव कथाओं का.. उद्भव, श्वेत झरनों का.. विस्तार,  अंतर संवादों का.. आदान-प्रदान,भावनाओं का.. महकना, रजनीगंधा का.. सब परिणाम है, तुम्हारे प्रेम में होने का.. -  शालिनी पाण्डेय 

सरु चलो ना

किराये के मकान की बालकनी से, बाहर झांकते हुए, एक दिन, उसने पूछा - सरु, कौन सा संगीत, सुनाई देता है, तुम्हें यहां ? कौन सा नजारा, दिखता है, किवाड़ों को  खोलने पर ? कंधे पर,  थोड़ा सा खुद को टिकाकर, वो बोला- देखो ये दीवार... कितनी बड़ी है, लेकिन... एक भी  दूब का तिनका  नहीं उग पाता  इस पर... कितनी  विषाक्तता है, साँसों में, भीतर इन  कोरी दीवारों के..... कुछ देर,  वो मौन रहा.... और सांसे जुटाकर   पुनः बोल उठा-  सरु चलो ना, लौट चलते है, वहाँ को, जहां से आरंभ हुए... चलो ना, लौट चलते है, अपने पहाड़ की ओर.... -शालिनी पाण्डेय

हिमालय हूँ मैं

चीड़, ओक, देवदार की खुशबू लिए कर रहा सुगंधित श्वासों को, बुरांश, ब्रह्मकमल के फूल खिला महका रहा घर-आंगन को, मोनाल, ट्रैगोपान की चहक से रोज सवेरे जगा रहा तुमको, किलकारी भड़ल, हिम् तेंदुए की  पाल रहा तुम्हारे आंचल में, बन हिमाद्रियों का जन्मदाता  कर रहा सुसज्जित केशों को, पंच बद्री, पंचकेदार का रूप लिए ध्यान और तप का स्थान हूं मैं, पूनम के शशि सा तेज लिए, सुशोभित तुम्हारे ललाट पर, रहूंगा सतत ही मौन खड़ा, तुम्हारी प्रहरी, हिमालय हूं मैं। -शालिनी पाण्डेय 

बचपन

बचपन  चाहे किसी का भी हो अमीर का या गरीब का, वो ख़्वाब देखता है, उसे  अनगिनत ख़्वाब देखने दो, क्योंकि बचपन बनाता है एक सुदृढ़ नींव  कल्पनों की, बड़ा होने पर  जिसपर खड़ी होती है  इमारत यथार्त की। - शालिनी पाण्डेय 

पहाड़ को जाती सड़क

जंगल को  दो हिस्सों में बांटती ये सड़क सीधी  मेरे पहाड़ को जाती है, जहां अब भी बसती है गाड़, गधेरों, बाघ, बण, कौतिक, ब्या, त्यार के बारे में सुनाई मेरी आमा की कहानियां, जो जीवन पर्यंत  उन्होंने बटोरी, मेरे लिए ताकि सैंंन में रहकर भी मैं बनी रहूँ पहाड़ी, और उनके चले जाने के बाद भी देख पाऊं उन्हें  पहाड़ के किसी डाणे में  घास काटते हुए। - शालिनी पाण्डेय  For those who don't understand pahadi गाड़: Small seasonal river stream गधेरा: an abrupt or steep fall बण: Forest कौतिक: Fair ब्या: Marriage त्यार: Festival आमा: Grandmother सैंन: Plain area डाणा: Low mountain

मां

अपनी संतानों द्वारा उपेक्षित किये जाने पर भी स्वम् को प्रदत्त कर्तव्यों का निर्वहन माँ नहीं भूलती । - शालिनी पाण्डेय 

चुपके से

चुपके से बिना पैरों के निशान छोड़े, रिश्तों की  इस कोलाहल भरी दुनिया से कहीं दूर  निकल जाने को जी चाहता है।  - शालिनी पाण्डेय