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नाराज़

मैं हजार कोशिशें  कर भी लूं अगर तुम्हें भुलाने की, एक बार को कह भी दूँ कि तुमसे नाराज़ हूं लेकिन सच तो ये ही है कि ना तुमसे  नाराज़ रहा जा सकता है ना भुलाया ही  जा सकता है। -शालिनी पाण्डेय 

सारी उम्र

टपकती बरसात अच्छी किताब फ़ैज़ की नज़्म और तुम्हारे साथ मैं अपनी सारी उम्र गुज़ार सकती हूं। - शालिनी पाण्डेय 

बारिश और गिले शिकवे

एक अंतराल के बाद किसी अपने के गले मिलने से मन पर इकठ्ठा हो रहे गिले-शिक़वे वैसे ही  दूर हो जाते है जैसे लंबे इतंजार के बाद आई बारिश से छतों पर जमा  धूल और मिट्टी..... - शालिनी पाण्डेय 

तमाशा

तुम्हें समझना मुश्किल है, पर तुम्हें सुलझाना  और भी मुश्किल है जैसे ही लगता है  समझ आ रही हो नए चौराहों  पर लाकर छोड़ देती हो पर अब सूरतों के बाज़ार से दूर सिर्फ अपने साथ  रहते हुए लगने लगा है थोड़ा लंबा ही सही  पर आखिर में तुम एक तमाशा ही तो हो  जिंदगी... - शालिनी पाण्डेय 

रामवती

बादल घिर आये है, सामने की तरफ आसमान का रंग स्याह हो गया है। तेज हवा ने सारे बादलों को आसमान में एक तरफ इकठ्ठा कर दिया है। मन ही मन में सोच रही थी आज बहुत बारिश आएगी। मैं छत पर खड़ी बादलों की ओर देख रही थी,कि तभी एक आवाज़ आयी - बारिश आयेगी और मेरी छत उड़ जायेगी। मैंने नीचे की ओर देखा तो रामवती थी। वो एक बड़े से पत्थर के ऊपर कपड़ों पर साबुन लगा रही थी। . . रामवती और मैं एक दूसरे को तीन महीनों से जानते है। 'जानते है' ये कहना ठीक नही होगा; बल्कि ये कहना- 'तीन महीनों से हम एक दूसरे को यूँ ही देखा करते है' ज्यादा ठीक होगा। आज तक किसी ने दूसरे से एक लफ्ज़ भी नही कहा। मैं जब भी छत पर टहलती हूँ, वो नीचे कुछ काम कर रही होती है और नजरें मिल जाने पर दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा देते है। बस इतना ही संवाद है हम दोनों के बीच।  रामवती की उम्र यही कोई 25-26 साल होगी या फिर इससे भी कम। उसके 2 बच्चे है, जिनके साथ वो कंस्ट्रक्शन की साइट पर बने ईट के बने कामचलाऊ घर में रहती है जिसकी छत पर एक प्लास्टिक की पन्नी लगी है। . . रामवती के लफ़्ज़ों को सुनने के बाद मैं सोच रही थी कि काश! इतनी ही बारिश आ...

साथ में जिये लम्हें

साथ में जिये लम्हें भीतर के किसी कोने में थोड़ी जगह घेरे रहते है और शुष्क मौसम से ऊब चुकी साँसों को  हवा देकर जिंदा रखते है.... - शालिनी पाण्डेय 

रोज कुछ

रोज कुछ उम्मीदें बिखर जाती है कुछ सपने अधूरे रह जाते है और कुछ वादे दहलीज की ओर टकटकी लगाए दम तोड़ जाते है। - शालिनी पाण्डेय