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मैं धूप हूँ

मैं धूप हूँ
और अँधेरे
तुम हो
मेरे सच्चे प्रेमी ,
तुम कहाँ कभी
मुझसे
जुदा होते हो !!

साँझ के ढलते ही
तुम मुझे
आलिंगन करते हो
और
माथा चूम कर
समेट लेते हो
अपने भीतर

और फिर
भोर के होते ही
धूप जैसे
मुझे बिखेर देते हो
और खुद
सिमट आते हो
मेरे भीतर।

- शालिनी  पाण्डेय

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