तलाश

ये तलाश ना जाने होगी कब पूरी
तलाश भीड़ में अपनों को खोजने की
तलाश खामोशी में शब्दों को बुनने की
तलाश सन्नाटे में संगीत पनपने की
तलाश हर चेहरे में खुशियां ढूढ़ने की

अजीब सी तलाश है यह जो
हर वक़्त कुछ खोजना चाहती है
हर लम्हे को यादगार बनाना चाहती है
हर करीबी पर खुशियां बरसाना चाहती है

एक पल को लगता है
कितनी व्यर्थ है ये तलाश
कितनी बड़ी मूर्खता है यह
इसका कुछ मुक़ाम नही
इससे कुछ हासिल नही

फिर महसूस होता है
मुक़ाम नही है तो क्या हुआ
कुछ हासिल ना हो तो क्या
कम से कम एक राह तो है
जो जीवन को दिशा दिखा रही है।

- शालिनी पाण्डेय

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