तज़ुर्बा

मुझे तज़ुर्बा था
जीवन को
बेफ़िक्री से
जीने का

और तुम्हें
तज़ुर्बा था
सोच सोच के
जीने का

दोनों अलग
है मगर है तो
तज़ुर्बे ही। ।

-शालिनी पाण्डेय

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