रात का ढक्कन


जब रात का ढक्कन खुला
तेरी यादें भाप सी उठकर
मिल गई कमरे की हवा से
और साँसों के साथ
सारा दिन टहलती रही
मेरे बाहर-भीतर ।

- शालिनी पाण्डेय

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