भावनाओं की चादर

बेफिक्र हो तुम
आज़ाद हो तुम
भावनाओं से परे हो तुम
और मैं एकदम विपरीत
ना बेफिक्र हो पाती हूँ
ना आज़ाद ही जी पाती हूँ
भावनाओं की चादर मैंने इस कदर ओढ़ ली है
कि कुछ और अनुभव ही नही कर पाती
इससे मैं यूं लिपटी हुई हूँ मानो
एक बिछड़ी प्रेमिका लिपटी है अपने प्रेमी से
जो अब नही चाहती कि वो
आंखों से एक पल के लिए भी ओझल हो
इस बिछड़न की कल्पना मात्र ही
मेरी रूह को कंपा देती है
नही नही
मुझसे ये भावनाओं की चादर नही छूटेगी
इसका त्याग करने से पहले
मैं पसंद करूँगी अपनी रूह को त्यागना

-शालिनी पाण्डेय

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