ललचाई निगाहें

आज मुलाकात हुई एक चिड़िया से
वो चिड़िया
जिसके पंख कतर कर रख दिये है
किसी मखमली से रूमाल में लपेटकर
और लटका दिए गए है किसी इमारत से
सभ्यता संस्कृति जैसे लुभावने नाम देकर
इसके साथ ही
कर दिया है विस्थापित पंखों की याद को भी
रिश्तों का उलाहना देकर

और इसकी लुभावट का जादू तो देखो
आज भी वो चिड़िया
गुमराह है इसकी चकाचोंध में
जी रही है एकतरफा जीवन
अब शायद वो भूल चुकी है
पंख फैलाकर हवा के रुख से उलट उड़ना
खो चुकी है क्षमता
जो प्रत्यक्ष नही है उससे परे देखने की
बस बन सजावट देख रही
सबको ललचाई निगाहों से।

-शालिनी पाण्डेय

Comments

  1. दुनिया सजावटी बनती जा रही हे ...फ़ूलॊ से लेकर पक्षी sbसब पे रंगीन रंग चढ़ गये है .....

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