मैं सोचती थी

मैं सोचती थी
कोई कविता लिखूँ
तुम्हारे लिए
मेरे लिए
और उन सभी
प्रेमिकाओं के लिए
जिन्होंने अपने
प्रेमियों से
बिछड़ने का
दर्द महसूस किया...

लेकिन,
मैं नहीं लिख पाई
ऐसी कोई कविता,
मैं बहुत नासमझ थी
या यूं कहूँ
असमर्थ थी,
कभी शब्द नहीं मिले
कभी वक़्त ने उलझाए रखा...
और अब
महामारी के इस दौर में
जब कुछ शेष नहीं रह गया
मैं ये कविता
लिखने बैठी हूं...

क्योंकि अब भी 
चाय की प्याली पर
तुम्हारे होठों का स्वाद 
महसूस हो रहा है,

गुलाबी पंखुड़ियों 
पर ठहरी ओस से
तुम्हारा प्यार
चू रहा है,

आज भी उस पुल पर, 
ढलती शामें
मिलन की आस का
इंतज़ार करती है,

रास्ते में बिखरे ठीठों
को अब भी लगता है
किसी रोज हम और तुम
उन्हें बटोरने आएंगे....

- शालिनी पाण्डेय 


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