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जब कभी

माना धूप जैसे मैं कभी
उड़ा ले जाती हूँ तुम्हारे रंगों को
लेक़िन
फ़िर मैं आती भी तो हूँ बसंत बन
उन रंगों को नया कर तुम्हें लौटाने।

~ शालिनी पाण्डेय

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